About Dr. Yagyadutt Sharma
Dr YagyaDutt Sharma
Shastri | Jyotish Acharya | Ph.D. (Indian Algebra) | Former Principal, Traditional Gurukul (2018–2021) | Assistant Professor, Central Sanskrit University (2022–Present)
डॉ. यज्ञदत्त शर्मा संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतिष्ठित विद्वान हैं। वे शास्त्री, ज्योतिष आचार्य और भारतीय बीजगणित में विद्यावारिधि (Ph.D.) उपाधिधारक हैं। 2018 से 2021 तक उन्होंने पारंपरिक गुरुकुल में प्राचार्य के रूप में कार्य किया और 2022 से अब तक केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य (Assistant Professor) के पद पर कार्यरत हैं।
“हमारी संस्कृति ही हमारा असली आधार है” इस मंत्र को जीवन का ध्येय मानते हुए डॉ. शर्मा पिछले 18 वर्षों से विलुप्तप्राय टांकरी लिपि के पुनर्जीवन और संरक्षण में सतत प्रयत्नशील हैं। उन्होंने इस प्रयास को केवल शोध तक सीमित न रखकर इसे जन-आंदोलन का रूप देने के लिए एक संगठन की स्थापना की।
उनका मानना है कि लिपि केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान की आत्मा है। इसी सोच के साथ वे कार्यशालाओं, शोध लेखन, सांस्कृतिक संगोष्ठियों और शैक्षणिक पहलों के माध्यम से टांकरी और पहाड़ी भाषाओं को पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी यात्रा पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध का अनूठा संगम है, जो उन्हें भारत की भाषाई और सांस्कृतिक धरोहर का सच्चा वाहक बनाती है।
टांकरी लिपि के पुनरूद्धार में डॉ. यज्ञदत्तशर्मा का योगदान।
टांकरी लिपि के सन्दर्भ में आज तक जो यह माना जाता रहा है कि कुछ वर्ण जैसे – स्वरों में ऋ, ॠ, ऌ, ॡ एवं व्यञ्जनों में श, ष, ज्ञ नहीं मिलते। तथा ङ, ञ ब, व, क्ष व्यञ्जनों के शुद्ध रूप को प्राप्त किया। मात्राओं में जो ऋ, ॠ नहीं मिलती थी उसे प्राप्त किया। उ, ऊ की मात्रा को संशोधित किया।
विशेषकर विभिन्न क्षेत्रों की पाण्डुलिपियों से सैंकड़ों संयुक्ताक्षरों को प्राप्त कर टांकरी मातृका के संयुक्ताक्षरों के नियमों को जानकर उन्हें स्थिर किया। जहां टांकरी लिपि में पहले किसी भी भाषा को शुद्ध रूप से लिखने में बहुत समस्याएं आतीं थी वह दूर हुई। अब किसी भी भाषा को बहुत सरलता, वैज्ञानिकता एवं पारम्परिक रूप से लिखने में बहुत सहायता प्राप्त हुई है। आज तक यह माना जाता रहा है कि टांकरी लिपि में शुद्ध रूप से किसी भी भाषा को नहीं लिखा जा सकता इस मिथक को डा. शर्मा ने अपने शोध से दूर किया। आज हजारों छात्र इनसे आनलाईन आफलाइन माध्यम से टांकरी लिपि को पूर्ण रूप से सीख रहे हैं।
टांकरी लिपि की वर्णमाला को एक विशेष पारम्परिक रूप से पढ़ाया जाता रहा है। इस विधि को सतमाई (वर्णोच्चारण शिक्षा) नाम से जाना जाता है। यह विधि पूर्ण रूप से लुप्त प्रायः हो गई थी। इसे डॉ. शर्मा ने पूर्ण रूप से संशोधित कर पुनः सुरक्षित किया है।
इस प्रकार का मौलिक एवं महत्वपूर्ण संशोधन अवश्य टांकरी जगत के लिए बहुत उपयोगी हुआ है। डॉ यज्ञदत्तशर्मा मूल रूप से पारम्परिक टांकरी परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। उसके साथ- साथ संस्कृत भाषा के प्रखर विद्वान् होने से वह इस महनीय कार्य को कर पाएं हैं।